साहित्यिक महाकुंभ: पूर्णिया में गूंजी 'द्विजदेनी' की वीरगाथा, रेणु के गुरु को साहित्यकारों ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

Edited By: Hemant yadav
Updated At: 31 March 2026 21:56:30

कलम के सिपाही रामदेनी तिवारी 'द्विजदेनी': फारबिसगंज के बाल साहित्यकार हेमंत यादव समेत कई दिग्गज पूर्णिया में सम्मानित

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विशेष रिपोर्ट: 'कलम और क्रांति' के महानायक द्विजदेनी—पूर्णिया में जुटे साहित्यकार, कहा- 'रेणु' के गुरु ने ही फूंका था आजादी का बिगुल

संवाददाता: टाइम्स भारत न्यूज़ डेस्क स्थान: पूर्णिया/फारबिसगंज तारीख: 31 मार्च, 2026

प्रस्तावना: इतिहास के झरोखे से एक महामानव का स्मरण

आजादी की लड़ाई केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों और शब्दों से भी लड़ी गई थी। बिहार के सीमांचल की धरती पर एक ऐसा ही व्यक्तित्व हुआ, जिसने अपनी लेखनी को तलवार बना लिया और अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। वह नाम है— पंडित रामदेनी तिवारी 'द्विजदेनी'। रविवार को पूर्णिया के छठ पोखर स्थित भगवान प्रसाद जायसवाल पुस्तकालय में द्विजदेनी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक भव्य परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने उन्हें 'राष्ट्रीय चेतना का अग्रदूत' करार दिया।

1. फारबिसगंज से पूर्णिया तक यादों का कारवां

इस साहित्यिक महाकुंभ में फारबिसगंज का प्रतिनिधित्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। 'द्विजदेनी क्लब फारबिसगंज' के अध्यक्ष और ख्याति प्राप्त बाल साहित्यकार हेमंत यादव, क्लब के संस्थापक बिनोद कुमार तिवारी और युवा कवि प्रभास बहरदार को इस परिचर्चा में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। यह आयोजन न केवल एक व्यक्ति की याद था, बल्कि सीमांचल के गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने का प्रयास भी था।

2. विद्वानों का मत: द्विजदेनी—क्रांति और साहित्य के संगम

कार्यक्रम की अध्यक्षता आकाशवाणी पूर्णिया के सेवानिवृत्त निदेशक श्री विजयनंदन प्रसाद ने की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि द्विजदेनी जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे न केवल एक उत्कृष्ट साहित्यकार थे, बल्कि एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने सीमांचल के दुर्गम इलाकों में घूम-घूमकर लोगों को गुलामी की बेड़ियों के खिलाफ खड़ा किया।

विद्वानों के संबोधन के मुख्य बिंदु:

  • फणीश्वरनाथ रेणु के गुरु: परिचर्चा में यह तथ्य प्रमुखता से उभरा कि मैला आंचल फेम विश्वविख्यात साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्यिक गुरु पंडित रामदेनी तिवारी 'द्विजदेनी' ही थे। उन्होंने ही रेणु जी की लेखनी को वह धार दी, जिससे ग्रामीण आंचलिकता को वैश्विक पहचान मिली।
  • शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना: गोरेलाल मेहता कॉलेज के प्राचार्य प्रमोद भारतीय और जिला स्कूल के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामनरेश भक्त ने कहा कि द्विजदेनी जी ने शिक्षा को हथियार बनाया। उन्होंने उस दौर में शिक्षण संस्थानों के माध्यम से युवाओं में देशप्रेम का जज्बा भरा।
  • साहित्यिक धरोहर: पूर्णिया कॉलेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. शंभू कुशाग्र ने द्विजदेनी जी की रचनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी कविताएं और लेख आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने आजादी के आंदोलन के समय थे।

3. 'द्विजदेनी क्लब' का सम्मान: फारबिसगंज का गौरव

आयोजन के दौरान फारबिसगंज से आए तीनों अतिथियों का विशेष सम्मान किया गया। आयोजकों ने हेमंत यादव, बिनोद कुमार तिवारी और प्रभास बहरदार को शाल ओढ़ाकर और पुस्तकें भेंट कर सम्मानित किया। हेमंत यादव ने इस अवसर पर कहा कि द्विजदेनी जी ने फारबिसगंज की मिट्टी को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहाँ से आजादी की मशाल जलाई। आज की युवा पीढ़ी को उनके बलिदान और उनकी साहित्यिक गहराई को समझने की जरूरत है।

4. कवि गोष्ठी: शब्दों से सजी श्रद्धांजलि

 

परिचर्चा के दूसरे सत्र में एक भव्य कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ। पूर्णिया और आसपास के क्षेत्रों से आए दर्जनों कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से पंडित रामदेनी तिवारी को श्रद्धांजलि दी।

  • सदानंद सुमन, यमुना प्रसाद बसाक और गिरिंद्र नाथ मिश्र ने अपनी कविताओं में देशप्रेम का ज्वार पैदा किया।
  • मनोज पाराशर, रानी सिंह, नीतू बाबू और प्रियंबद जायसवाल की रचनाओं ने द्विजदेनी जी के संघर्षमय जीवन के विभिन्न पहलुओं को जीवंत कर दिया।
  • पवन कुमार जायसवाल ने मंच का संचालन करते हुए द्विजदेनी जी के कृतित्व को 'अमर धरोहर' बताया।

5. टाइम्स भारत न्यूज़ का विश्लेषण: क्यों विस्मृत हो रहे हैं ऐसे महानायक?

पंडित रामदेनी तिवारी 'द्विजदेनी' ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। वे उस पीढ़ी के थे जिसने जेल की यातनाएं सही और अभावों में रहकर साहित्य सृजन किया। टाइम्स भारत न्यूज़ यह सवाल उठाता है कि क्या वर्तमान पाठ्यक्रम और सरकारी योजनाओं में ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानियों को वह स्थान मिल रहा है जिसके वे हकदार हैं?

परिचर्चा में उठी यह मांग कि पूर्णिया प्रमंडल के किसी प्रमुख संस्थान या सड़क का नाम 'द्विजदेनी जी' के नाम पर रखा जाना चाहिए, अत्यंत तर्कसंगत है। उनके बिना फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्यिक परिचय भी अधूरा है।

6. निष्कर्ष: एक नई चेतना का उदय

भगवान प्रसाद जायसवाल पुस्तकालय का यह प्रयास सराहनीय है। इस तरह के कार्यक्रमों से ही आने वाली पीढ़ी को पता चलेगा कि जिस आजादी की हवा में हम सांस ले रहे हैं, उसकी कीमत 'द्विजदेनी' जैसे नायकों ने अपनी कलम और अपने बलिदान से चुकाई है।

 

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